PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

Class 12 Hindi Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

Hindi Guide for Class 12 PSEB गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘गुरु गोबिन्द सिंह ने वर याचना के अन्तर्गत क्या वर माँगा है ?
उत्तर:
गुरु जी ने पारब्रह्म की शक्ति से यह वर माँगा है कि वे अच्छे कर्म करने से कभी पीछे न हटें । निर्भय होकर : शत्रु के साथ जा भिड़ें और अपनी जीत को निश्चित करें। जब जीवन की अवधि समाप्त हो जाए अर्थात् मृत्यु निकट हो तो युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मरूँ।

प्रश्न 2.
‘अकाल उस्तुति’ में गुरु जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन कैसे किया है ?
उत्तर:
गुरु जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि वह रूप, रंग और आकृति से रहित है अर्थात् निर्गुण या निराकार है। वह जन्म-मरण के बन्धन से भी मुक्त है अर्थात् अजर-अमर है। वह आदि पुरुष है तथा धर्म-कर्म में कुशल है। उस पर जन्त्र, तन्त्र तथा मन्त्र का भी कोई असर नहीं होता अथवा वह इन से परे है। वह निराकार हाथी से लेकर चींटी तक के हृदय में बसता है।

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प्रश्न 3.
गुरु जी ने ‘सांसारिक नश्वरता’ के अन्दर किन-किन राजा, महाराजा, अभिमानी तथा बलि पुरुषों के उदाहरण दिये हैं-वर्णन करें।
उत्तर:
गुरु जी ने सांसारिक नश्वरता के प्रसंग में सतयुग के राजा मान्धाता, रघुकुल के रजा दिलीप, शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह तथा मानी दुर्योधन के उदाहरण दिये हैं जो अपनी मृत्यु न टाल सके और मिट्टी में मिल गए।

प्रश्न 4.
‘भक्ति भावना’ में गुरु जी ने मानव को प्रभु पर विश्वास रखने और अडिग रहने का क्या संदेश दिया है ?
उत्तर:
भक्ति भावना में गुरु जी ने मनुष्य को व्यर्थ के आडंबरों में भटकने से रोकते हुए उस सर्वपालक ईश्वर पर विश्वास रखने के लिए कहा है जो स्वयं सब प्रकार के विकारों से रहित है तथा सृष्टि के प्रत्येक प्राणी का पोषक है। उसकी भक्ति ही मनुष्य को समस्त बंधनों से मुक्ति दिला सकती है।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 5.
काम न क्रोध न लोभ न मोह ……….. पति लै है।
उत्तर:
प्रस्तुत सवैया में गुरु गोबिन्द सिंह जी ईश्वर की विशेषताओं का परिचय देते हुए कहते हैं कि उस ईश्वर में काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, भोग, भय आदि कुछ नहीं है अर्थात् वह इन विकारों से परे हैं। वह देह रहित है, सबसे स्नेह करने वाला है फिर भी विरक्त है। उसका कोई घर बार नहीं, वह सबसे अच्छा है। वह जानने वालों को भी देता है और अनजानों को भी देता है अथवा वह ज्ञानियों और अज्ञानियों दोनों को देता है, ज़मीन वाले को और बिना ज़मीन वाले को भी देता है अर्थात् अमीर हो या ग़रीब वह सब को देता है। अरे मूर्ख मनुष्य तू इधर उधर क्यों भटकता फिरता है तुम्हारी सुध तो सुंदर लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान लेंगे।

प्रश्न 6.
देहि सिवा बर मोहि इहै ………. जूझ मरों॥
उत्तर:
गुरु जी परम शक्ति से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि मुझे ऐसा वरदान दो कि मैं कभी भी अच्छे कर्म करने से पीछे न हटूं। जब मैं युद्ध भूमि में जाऊँ तो मैं शत्रु से भयभीत न होऊँ, उससे भिड़ जाऊँ और अपनी विजय को निश्चित हिन्दी पुस्तक-12 बना दूं। मैं इस वीरता से लइँ कि मेरी जीत निश्चित हो जाए। मैं सदा मन से आपका ही शिष्य हूँ। इसी लालच से कि मैं आपके गुणों का गान कर रहा हूँ जब मेरी आयु की अवधि समाप्त हो जाए अर्थात् मेरी मृत्यु होने वाली हो तो मेरी यह इच्छा है कि मैं युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मरूँ।

PSEB 12th Class Hindi Guide गुरु गोबिन्द सिंह Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु गोबिंद सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
22 दिसम्बर, सन् 1666 को बिहार के पटना शहर में।

प्रश्न 2.
गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना कब और कहाँ की थी?
उत्तर:
सन् 1699 ई० को वैसाखी वाले दिन आनंदपुर साहिब में।

प्रश्न 3.
गुरु जी ने किन भाषाओं में साहित्य रचना की थी?
उत्तर:
फ़ारसी और ब्रज भाषाओं में।

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प्रश्न 4.
‘वर याचना’ में किससे याचना की गई है?
उत्तर:
पारब्रह्म से।

प्रश्न 5.
गुरु जी के द्वारा निराकार-निर्गुण किसे कहा गया है?
उत्तर:
ईश्वर को।

प्रश्न 6.
किस का पार पाना अत्यंत कठिन है?
उत्तर:
आदि पुरुष का।

प्रश्न 7.
सतयुग में किन छत्रधारियों के अभिमान का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
राजा मान्धाता और रघुकुल के राजा दिलीप।

प्रश्न 8.
गुरु जी ने समदर्शी किसे कहा है?
उत्तर:
ईश्वर को।

प्रश्न 9.
गुरु जी के अनुसार परमात्मा में कौन-कौन से विकार नहीं होते?
उत्तर:
काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, भोग, भय आदि।

प्रश्न 10.
गुरु जी ने परमात्मा से क्या-क्या मांगा था?
उत्तर:
अच्छे कर्म, निर्भयता और शक्ति।

प्रश्न 11.
गुरु जी कहाँ ज्योति-जोत समा गए थे?
उत्तर:
नांदेड़ (महाराष्ट्र)।

प्रश्न 12.
गुरु जी ने किन-किन अभिमानी और शक्तिशालियों के नाम उदाहरण स्वरूप दिए थे?
उत्तर:
राजा मान्धाता, दिलीप, दारा शिकोह और दुर्योधन।

प्रश्न 13.
‘चण्डी चरित्र’ किसकी रचना है ?
उत्तर:
गुरु गोबिन्द सिंह जी की।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 14.
काहे को डोलत है तुमरी सुधि,..
उत्तर:
सुंदर सिरी पदमापति लै है।

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प्रश्न 15.
भोग-भोग भूम…………………… ।
उत्तर:
अन्त भूम मैं मिलत हैं।

प्रश्न 16.
रूप राग न रेख………
उत्तर:
न जन्म मरन बिहीन। हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
गुरु जी की वाणी ब्रजभाषा में नहीं है।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 18.
गुरु जी ने निराकार ब्रह्म का चित्रण किया था।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
कवि ने नेताओं को किससे पीड़ित माना है?
उत्तर:
अहम् से पीड़ित।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. गुरु जी के अनुसार किसका पार पाना अत्यंत कठिन है ?
(क) आदि पुरुष का
(ख) प्रभु का ।
(ग) ईश्वर का
(घ) नदी का
उत्तर:
(क) आदि पुरुष का

2. गुरु जी ने समदर्शी किसे कहा है ?
(क) मन को
(ख) ईश्वर को
(ग) संसार को
(घ) धन को
उत्तर:
(ख) ईश्वर को

3. गुरु जी परम शक्ति से कौन से कार्य करने का वरदान मांगते हैं ?
(क) अच्छे कर्म
(ख) नित्य कर्म
(ग) सत्य कर्म
(घ) आदि कर्म
उत्तर:
(क) अच्छे कर्म

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4. रघुकुल के राजा कौन थे ?
(क) मान्धाता
(ख) दिलीप
(ग) अश्वात्थामा
(घ) महीप
उत्तर:
(ख) दिलीप

5. दुर्योधन जैसे बड़े-बड़े राजा किसके कारण नष्ट हो गए ?
(क) घमंड के
(ख) नमंड के
(ग) धन के
(घ) ईर्ष्या के
उत्तर:
(क) घमंड के

गुरु गोबिन्द सिंह सप्रसंग व्याख्या

देह सिवा, बर मोहि इहै, सुभ कर्मन ते कबहूँ न टरों।
न डरों अरि सों जब जाइ लरों, निसचे करि अपनी जीत करों।
अरु सिख हों अपने ही मन को, इह लालच हउ गुन तउ उचरों।
जब आव की अउध निदान बनै, अति ही रन में तब जूझ मरो॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
देह = प्रदान करो। इहै = यही। न टरों = न टलू, न हहूँ। अरि = शत्रु। सिख हों = शिष्य हूँ। आव = आयु। अउध = अवधि ।

प्रसंग:
प्रस्तुत सवैया गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित ‘वर याचना’ शीर्षक कविता से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में गुरु जी ने पारब्रह्म की शक्ति से वर देने की याचना की है।

व्याख्या:
गुरु जी परम शक्ति से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि मुझे ऐसा वरदान दो कि मैं कभी भी अच्छे कर्म करने से पीछे न हटूं। जब मैं युद्ध भूमि में जाऊँ तो मैं शत्रु से भयभीत न होऊँ, उससे भिड़ जाऊँ और अपनी विजय को निश्चित हिन्दी पुस्तक-12 बना दूं। मैं इस वीरता से लइँ कि मेरी जीत निश्चित हो जाए। मैं सदा मन से आपका ही शिष्य हूँ। इसी लालच से कि मैं आपके गुणों का गान कर रहा हूँ जब मेरी आयु की अवधि समाप्त हो जाए अर्थात् मेरी मृत्यु होने वाली हो तो मेरी यह इच्छा है कि मैं युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मरूँ।

विशेष:

  1. कवि ने आदि शक्ति से अपनी विजय तथा उनकी कृपा की कामना की है।
  2. ब्रजभाषा, सवैया छंद, अनुप्रास अलंकार तथा वीर रस है।

अकाल उस्तुति

रूप राग न रेख रंग, न जन्म मरन बिहीन।
आदि नाथ अगाध पुरुख, सुधरम करम प्रबीन।
जन्त्र मन्त्र न तन्त्र जाको, आदि पुरख अपार।
हसत कीट बिखै बसै सब, ठउर मैं निरधार॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
रूप राग न = अरूप। रेख-रंग न = निराकार, आकृति रहित। बिहीन = रहित। अगाध पुरुख = अकाल पुरुष। अपार = असीम, जिसे पार न किया जा सके। बिखै = बीच। ठउर = स्थान।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यावतरण गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित ‘अकाल उस्तुति’ से अवतरित है। इसमें गुरु जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन किया है।

व्याख्या:
गुरु जी कहते हैं कि ईश्वर रूप, रंग और आकृति से रहित है अर्थात् वह निराकार, निर्गुण है। वह जन्म-मरण से भी परे है। वह अकाल पुरुष है; आदिनाथ है-जो धर्म और कर्म में कुशल है। उस पर जंत्र, तंत्र और मंत्र का कोई असर नहीं होता अथवा वह जंत्र, तंत्र और मंत्र से परे है। वह आदि पुरुष है जिसका पार पाना कठिन है। वह हाथी, कीड़े आदि सब में निराकार रूप से विद्यमान रहता है।

विशेष:

  1. कवि ने निराकार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया है।
  2. ब्रज भाषा का प्रयोग है।
  3. शांत रस है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।

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सांसारिक नश्वरता

जोगी जती ब्रह्मचारी बड़े बड़े छत्रधारी,
छत्र ही की छाया कई कोस लौ चलत हैं।
बड़े बड़े राजन के दाबत फिरत देस,
बड़े बड़े राजनि के दर्प को दलत हैं।
मान से महीप औ दिलीप केसे छत्रधारी,
बड़ो अभिमान भुजदंड को करत है।
दारा से दिलीसर, दर्बोधन से मानधारी,
भोग-भोग भूम अन्त भूम मै मिलत हैं॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
जती = संन्यासी, तपस्वी। छत्रधारी = छत्र धारण करने वाले बड़े-बड़े महंत। कोस = दूरी का एक मापदंड-सवा मील का एक कोस होता है। दाबत फिरत = दबाते फिरते हैं, अधीन करते हैं । दर्प = घमंड। दलत हैं = कुचल देते हैं। मान से = सत युग के एक राजा-मान्धाता जैसे। महीप = राजा। दिलीप = रघुकुल के एक राजा-राजा दिलीप के पुत्र ही राजा रघु हुए जिनके नाम पर रघुकुल जाना जाता है। भुजदंड = भुजाओं की शक्ति, बाहुबल। दारा = शाहजहाँ का बेटा, औरंगज़ेब का बड़ा भाई। दिलीसर = दिल्ली का राजा। मानधारी = घमण्डी। भूम = भूमि।

प्रसंग:
प्रस्तुत कवित्त गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा लिखित ‘सांसारिक नश्वरता’ से लिया गया है, जिसमें गुरु जी ने सांसारिक नश्वरता पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या:
गुरु जी कहते हैं कि योगी, यती अर्थात् संन्यासी या तपस्वी तथा बड़े-बड़े छत्रधारी महंत, जो छत्रधारण कर कई-कई कोस चला करते थे तथा बड़े-बड़े राजा जो दूसरे देशों को अपने अधीन करते थे और बड़े-बड़े राजाओं के घमंड को चूर करते थे। सतयुग के राजा मान्धाता और रघुकुल के राजा दिलीप जैसे छत्रधारी जो अपने बाहुबल पर बड़ा अभिमान करते थे तथा दारा जैसे दिल्ली के बादशाह और दुर्योधन जैसे घमंडी राजा धरती का भोग कर अन्त में धरती में ही मिल गए अर्थात् सभी शक्तिशाली और घमंडी राजा अपनी मृत्यु को न टाल सके अन्त में वे सब मिट्टी में मिल गए।

विशेष:

  1. गुरु जी के कहने का अभिप्राय यह है कि यह संसार अथवा यह मानव शरीर नाशवान् है अतः इस पर घमण्ड नहीं करना चाहिए।
  2. ब्रज भाषा सरल, सरस एवं प्रवाहमयी है।
  3. कवित्त छंद एवं शांत रस है।
  4. अनुप्रास एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

भक्ति भावना

काम न क्रोध न लोभ न मोह न रोग न सोग न भोग न भै है।
देह बिहीन सनेह सभो तन नेह बिरकत अगेह अछै है॥
जान को देत अजान को देत, जमीन को देत जमान को दै है।
काहे को डोलत है तुमरी सुधि, सुन्दर सिरी पदमापति लै है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
भोग = भोग विलास, ऐश्वर्य। सभी तन = सबसे। विरकत = विरक्त, उदासीन । अगेह = बिना घर-बार के। डोलत = भटकते। सुधि लैहे = ध्यान पदमापति = लक्ष्मी के पति, भगवान विष्णु।

प्रसंग:
प्रस्तुत सवैया गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा लिखित ‘भक्ति भावना’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने सहजभाव से परमात्मा पर आस्था रखने के लिए कहा है।

व्याख्या:
प्रस्तुत सवैया में गुरु गोबिन्द सिंह जी ईश्वर की विशेषताओं का परिचय देते हुए कहते हैं कि उस ईश्वर में काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, भोग, भय आदि कुछ नहीं है अर्थात् वह इन विकारों से परे हैं। वह देह रहित है, सबसे स्नेह करने वाला है फिर भी विरक्त है। उसका कोई घर बार नहीं, वह सबसे अच्छा है। वह जानने वालों को भी देता है और अनजानों को भी देता है अथवा वह ज्ञानियों और अज्ञानियों दोनों को देता है, ज़मीन वाले को और बिना ज़मीन वाले को भी देता है अर्थात् अमीर हो या ग़रीब वह सब को देता है। अरे मूर्ख मनुष्य तू इधर उधर क्यों भटकता फिरता है तुम्हारी सुध तो सुंदर लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान लेंगे।

विशेष:

  1. कवि ईश्वर को समदर्शी बताते हुए सब की सुध लेने वाला बताया है।
  2. ब्रजभाषा सरल, सरस एवं प्रवाहमयी है।
  3. सवैया छंद एवं शांत रस है।
  4. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।

गुरु गोबिन्द सिंह Summary

गुरु गोबिन्द सिंह जीवन परिचय

गुरु गोबिन्द सिंह जी का जीवन परिचय दीजिए।

सिखों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म 22 दिसम्बर, सन् 1666 ई० को बिहार प्रदेश के पटना शहर में हुआ। अपने पिता गुरु तेग़ बहादुर जी के हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने पर नौ वर्ष की अवस्था में ही आप गुरु गद्दी पर विराजमान हुए। गुरु जी ने अपने जीवन काल में मुग़ल शासकों के साथ अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं। इन लड़ाइयों में गुरु जी के बेटे भी शहीद हुए। सन् 1699 ई० की वैसाखी वाले दिन गुरु जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने न केवल अपना नाम गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह किया बल्कि प्रत्येक सिक्ख को अपने नाम के साथ सिंह शब्द जोड़ने का आदेश भी दिया।

गुरु जी ने अपने जीवन में अनेक साहित्यिक रचनाएँ भी की, जिनमें जाप साहिब, चंडी चरित्र, बिचित्तर नाटक, गोबिन्द गीता और गिआन प्रबोध प्रसिद्ध हैं। गुरु जी ने फ़ारसी और ब्रज भाषाओं में साहित्य रचा। 7 अक्तूबर, सन् 1708 ई० में नांदेड़ (महाराष्ट्र) में गुरु जी ज्योति-जोत समा गए।

गुरु गोबिन्द सिंह छंदों का सार

श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित ‘वर याचना’ में कवि ने परमब्रह्म की शक्ति से शुभ कर्म करने, युद्धभूमि में वीरता से लड़ने की याचना की है। ‘अकाल उस्तुति’ में उन्होंने निराकार किन्तु कण-कण में व्याप्त अकाल पुरूष का वर्णन किया है। ‘सांसारिक नश्वरता’ में कवि ने मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराते हुए बताया है. कि सब ने एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। ‘भक्ति भावना’ में कवि ने ईश्वर के सर्वपालक रूप का वर्णन करते हुए उन्हें संसार के प्रत्येक प्राणी का ध्यान रखने वाला बताया है।

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